वीर अभिमन्यु पर हिंदी में कविता: Poems on Veer Abhimanyu

आज हम आपको इस लेख में महाभारत काल से जुड़ी हुई अर्जुन पुत्र वीर अभिमन्यु  Poems on Veer Abhimanyu एक कविता बताएंगे। जिसमे आप उनके जीवन से यह सिख सकते हैं कि हमे विषम परिस्थितियों में कैसे आगे बढ़ना चाहिए।

अर्जुन पुत्र वीर अभिमन्यु महाभारत काल के सबसे सर्वस्रेष्ट् महान योद्धा थे जो मात्र सोलह साल की उम्र में ही युद्ध भूमि में कूद पड़े थे और अपने साहस के परिचय से रण भूमि में सबको चौका दीए थे। तो आईए जानते हैं।  Poems on Veer Abhimanyu वीर अभिमन्यु पर कविताएं।

वीर अभिमन्यु पर हिंदी में कविता: Poems on Veer Abhimanyu
Images created by -add text

वीर अभिमन्यु पर कविताएं: Poems on Veer Abhimanyu

भोर भवर हुई कुरुक्षेत्र की धर्मयुद्ध मैदान में
वीर योद्धाओं की जमघट लगी युद्ध मैदान में
हुई शंखनाद किये सब एक दूसरे को ललकार
तेरहवें दिन का यह महासंग्राम थे सब तैयार
जहा बाणो की सर शैया पर थे भीष्म पितामह
तब शकुनि ने एक जाल बुनी गुरुदेव को सेनापति बना युधिष्ठिर को बंदी बनाओ युद्ध की समाप्ति कराओ
जिसमे फंस गए गुरु द्रोणाचार्य वं सूर्य पुत्र कर्ण महान
फिर शुरू हुआ रणभूमि में बाणो की वर्षों
जहां गुरुवर द्रोण ने बड़ी कोहराम मचाया
पांडव सेना को विचलित करने का पूर्ण बलप्रयोग किया।

निज सेना की यह दसा देख अर्जुन को क्रोध अपार हुआ
जहां बज उठी पांचजन्य फिर गांडीव का टंकार हुआ
कौरव सेना के होस उड़े जब गुरुवर का रथ चूर हुआ
फिर कहा द्रोण दुर्योधन से मैं उससे पार न पा सका
अर्जुन के रहते कोई युधिष्ठिर को बंदी बना न सकता
पांडव पुत्रों के नैनो में देख तब दुर्योधन यह क्रोधाग्नि
शकुनी ने मिल दुर्योधन एक और चाल चली
मिल अपने मित्र से दुर्योधन अर्जुन को तब ललकारा था।

और क्षल से कोसों तब अर्जुन को उसने दूर किया
और मौका पा तब एक चक्रव्यूह का घोषणा किया
जिसे कोई भेद न सके, जहां पांडव की हार हो
जिसे सुन तब पांडु पुत्र युधिष्ठिर चिंतित हुये।
बिन अर्जुन इस चक्रव्यूह को कैसे भेदा जाए
सोचकर तब पांडव सेना भयभीत हुआ।

समर मुंड से पाट दिया कुछ ऐसा चित्र विचित्र हुआ
अब न रहा कोई शेष विकल्प ऐसा युधिष्ठिर कहा
हार ही मनुज पर सामने पहाड़ को कैसे पार करू
तभी वहां शेरों से गरजता अर्जुनपुत्र अभिमन्यु आया
निज तात को दुखी देख फिर उन्हें शांत कराया
बोला ऊंचे स्वर में मैं भेदूँगा चक्रव्यूह का सातों द्वार।

हा हा तात श्री मुझे ज्ञात है सात में से छः द्वार का ज्ञान
माँ के गर्भ में था मैं जब तब सुनी थी चक्रव्यूह गाथा
जिसे सुन युधिष्ठिर बोले अभी तुम निज बालक हो
बिन तुम्हारे मात-पिता के आज्ञा के कैसे मैं हा करू
क्षल कपट का नही है तुम्हें कोई सम्पूर्ण ज्ञान
कैसे भेजू समरभूमि के उन रणबांकुरों के बीच तुम्हें
अपयश वश कुछ अनर्थ हुआ तो जीते जी मर जाएंगे।

फिरभी चक्रव्यूह में रण करने की,अभिमन्यु ने ठानी थी
अन्तः धर्मराज तात श्री से ले सुभद्रा सूत आज्ञा
चरण चूम वह वीर रणबांकुरों के तब बीच चला
दाव पर सब कुछ लगा कर धर्म का जुआ खेलने चला
हार की प्रतिध्वनि विजयी ध्वनि में,वह मोड़ने चला
काँप उठी तब सागर की लहरें, सिंहों का गर्जन डोला
जो धनुष बाण ले के चला वह 16 साल का योद्धा था
सबने देखा कोई और नहीं यह अर्जुन सूत अभिमन्यु था

वीर अभिमन्यु पर कविताएं: Poems on Veer Abhimanyu
Images created by -add text

फिर अभिमन्यु के पीछे ही कुछ तेज चले कुछ धीम चले,
कुछ पैदल, घोड़े,रथ सवार ले गदा गदाधर भीम चले
और पहुचे जब पहले द्वार,जहां खड़े थे जयद्रथ महान
फिर उसने गुरु द्रोण के चरणों में, उसने तीर चलाया था
चरण वंदना करके उनकी, अपना शीश नवाया था
और अपनी शक्ति से धर्म ध्वज लहराया।

चंद पलो में जयद्रथ को पछाड़ प्रथम द्वार पार किया
सोलह वर्ष का वह बालक समर भूमि में दम दिखाया
जैसे ही दूसरे द्वार की ओर बढ़ा तब नयन घुमाकर देखा।

जहां पांडु पुत्र भीम बलशाली को जयद्रथ ने रोका था
फिरभी अभिमन्यु रुका नही अकेला ही वह आगे चला
रणबांकुरों पर बाणों की बर्षा बरसाते हुय वह चला
अब अभिमन्यु था अकेला सामने था शत्रु का मेला
जहां अभिमन्यु एक एक कर, भिड़ा ले झुंडों का मेला
ऐसे करते हुए वह तीसरे द्वार को तोड़ भी पार किया
कौन था जो आज रोक पाए वीर अभिमन्यु के वार को
लासो से पटने लगी धरा जब मुंड मुंड पे मुंड गिरने लगा।

रक्तो की जैसी नदियां बहने लगी ,कैसा था यह धर्म युद्ध
जहां था दोनो तरफ अपने वही हुए खून को सब प्यासे
बाणो की बर्षा होती ,तलवारें की झंकार ,गद्दों की टंकार
यह थी अधर्म पर धर्म ध्वज लहराने की महासंग्राम
प्राण हथेली पर ऱखकर, सिंहों से तब वह खेल था।
वह सिंह का छोटा शावक, सुभद्रा सिंहों की मर्दानी थी
कैसे डर जाता सिंहों से, वह भी सिंह का शावक था।

ऐसे कर लड़ बारी-बारी से उसने सबको परास्त किया
क्षमा आये मांगने उन्हें क्षमा किया बाकी को श्मशान पहुचाया
यह सब देख कौरव सेना में भगदड़ मची,हुई कोलाहल
शत्रु सेना डर से भागे,दुष्ट दुर्योधन हुआ परेशान
जिसे देख पांडव सेना हुए अति सब प्रशन्न
वीर अभिमन्यु का, महिमा मंडन शुरू हुआ।

धर्मराज युधिष्ठिर समेत भीम चारो भाई का मान बढ़ा
ऐसएक एक करके उसने, छह द्वार को तोड़ दिया
हर द्वार पर उसने, एक महारथी को पीछे पछाड़ दिया
शत्रु को पीछे करने की,वह रण की रीति पुरानी थी
हर वीर बलिदानी की यही अमर कहानी थी
धर्मरक्षा को युद्धभूमि यह नीति सबको अपनानी थी।

और यही अभिमन्यु करता गया, विजयी होता गया
आखिर में जब वह पहुचा था ,चक्रव्यूह के सातवें द्वार
तब दुर्योधन समेत गुरु द्रोण ,कृपाचार्य सब घबराया था
अब वह दिन की आधी पहर,कौरवों को डर सताता था
जहां एक साथ थे कौरव सेना में सात श्रेष्ठ महारथी महान।

अभिमानि दुर्जोधन कर्ण महादानी चिरंजीवी अश्वत्थामा, कुलऋषि कृपाचार्य,गुरु द्रोण जैसे विद्वान वीर महाज्ञानी
तो वही दूसरी तरफ अर्जुन पुत्र था वीर अभिमन्यु अकेला
फिर वह न भयभीत हुआ न जरा सा भी किंचित
और पल भर में दुर्योधन दुशासन ,विकर्ण,कृतवर्मा अश्व्थामा,द्रोण कर्ण को हरा दिया मारा शकुनी मामा को,
वही कौरवों को अभिमान तोड़ दिया सम्मुख शीश झुका।

जहां हुआ भाई भतीजा एक तांडव दुश्मनी में ऐसा हुआ
अपनी शक्ति की ध्वज वीर से आगे कौन लहराता हुआ
पहुंच गया वीर चला रणबांकुरों में शस्त्र बरसाता हुआ
जहा कौन था जो उसके रोक पाए आज इसके वार को
जहां एक साथ थे कौरव सेना में सात श्रेष्ठ महारथी महान।

अभिमानि दुर्जोधन कर्ण महादानी चिरंजीवी अश्वत्थामा, कुलऋषि कृपाचार्य,गुरु द्रोण जैसे विद्वान वीर महाज्ञानी
तो वही दूसरी तरफ अर्जुन पुत्र था वीर अभिमन्यु अकेला
फिरभी चक्रव्यूह में मन क्यों न मानता उस वीर योद्धा का
तब हार होता देख अंतिम, दुर्योधन का था साहस डोला
जहां शत्रुओं ने डर गए लेकिन किये एक क्षल षड्यंत्र
वीर योद्धाओं कैसे मारे कायरो का मंत्र दिया तब दुर्योधन।

फिर दुर्योधन हो गया कुपित ले सबका नाम था पुकारा
जहां एक साथ सबने मिलके मारे एक फूल सी वीर को
कायर निर्लज्ज के सम्मान रणभूमि के इस  चक्रव्यूह में
अकेला खड़ा था कुछ वर्षो का छोटा  योद्धा महान
तो वही दूसरी तरफ वीर महारथियों की थी शक्ति अपार।

जहां सब थे अपने एक दूसरे के रक्त,मुंड,धड के प्यासे अंजान थे चक्रव्यूह स्वयं का है या विजय वीरगति द्वार का
फिरभी न माने तब सात महारथी , एक साथ सब टूटे थे।
एक छड विचलित नही हुआ वह पसीने सभी के छुटे थे।
तब जैसेमानो हर दिशा में जैसे रक्त की नदियां बहने चली
मारे वहां एक लाल को खोए अपने अपने अनेकलाल को
फिर न मन सबने,अभिमन्यु के रथ तोड़ सारथी को मारा

कुरुक्षेत्र समेत रो सब रहा है ये धरती गगन
कैसी है ये इनकी सौगन्ध जैसे
इस तरफ घायल है सेना,उस तरफ चलती पतन
आज इसकी चिंता से उठ रहा है वो धुँआ
युद्ध का मैदान जैसे बन गया हो अंधा कुआं
कोई दुश्मनी युद्ध के मैदान में ऐसे चली
हर दिशा में जैसे नदियाँ रक्त की बहती चली
फिर नया सूरज उगेगा, छायेगी वो लालिमा।

और भी पढ़े: 

Leave a Comment